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    200 वर्ष प्राचीन स्वामीनारायण मंदिर में पुरुषोत्तम मास की धूम

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    शिक्षापत्री लिखते हुए स्वामीनारायण भगवान के दिव्य दर्शन, शिक्षापत्री के महत्व पर हुआ विशेष प्रवचन

    बुरहानपुर के सीलमपुरा स्थित लगभग 200 वर्ष प्राचीन स्वामीनारायण मंदिर में पावन पुरुषोत्तम मास के अवसर पर धार्मिक आयोजनों की श्रृंखला जारी है। मंदिर में प्रतिदिन दिव्य अभिषेक, कथा और भजन-कीर्तन का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हो रहे हैं।
    कथा के दौरान शास्त्री चंद्रप्रकाश स्वामी ने भगवान स्वामीनारायण के बुरहानपुर आगमन का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि प्राचीन समय में भगवान स्वामीनारायण नीलकंठवर्णी अवतार में बुरहानपुर पहुंचे थे। उस दौरान उन्होंने ताप्ती नदी के बीच स्थित हाथीनुमा पत्थर पर बैठकर दही-रोटी ग्रहण की थी। इसी समय भगवान के मन में विचार आया था कि बुरहानपुर को स्वामीनारायण संप्रदाय का मुख्य केंद्र बनाया जाए, लेकिन संतों और भक्तों की सुगमता को ध्यान में रखते हुए बाद में वड़ताल धाम को मुख्य पीठ बनाया गया। उन्होंने कहा कि बुरहानपुर आज भी भगवान स्वामीनारायण की विशेष कृपा स्थली माना जाता है।
    मंदिर में आयोजित दिव्य अभिषेक में मुख्य रूप से रमेश भाई दलाल, अध्यक्ष श्री संकल पंच गुजराती मोढ़ वणिक समाज ने समाज की उन्नति, समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य की कामना के साथ भगवान लक्ष्मी नारायण देव एवं हरिकृष्ण महाराज का दुग्ध, शहद, पंचामृत एवं विभिन्न पवित्र नदियों के जल से अभिषेक किया,रमेश दलाल का मानना है कि ऐसे दिव्य अभिषेक से समाज में सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक वातावरण का संचार होता है।

    अभिषेक के बाद भगवान स्वामीनारायण के दिव्य दर्शन श्रद्धालुओं को कराए गए, जहां भगवान को शिक्षापत्री लिखते हुए दर्शाया गया। इस अवसर पर शास्त्री चिंतन प्रियदास जी ने शिक्षापत्री के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शिक्षापत्री केवल एक ग्रंथ नहीं बल्कि मानव जीवन को धर्म, सदाचार, संयम और सेवा के मार्ग पर चलाने वाला दिव्य मार्गदर्शन है।
    उन्होंने बताया कि भगवान स्वामीनारायण द्वारा संस्कृत भाषा में लिखित शिक्षापत्री में 212 श्लोक हैं, जिनमें गृहस्थ, संत, राजा, व्यापारी, विद्यार्थी और समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए जीवन जीने के आदर्श नियम बताए गए हैं। शास्त्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि “धर्मो रक्षति रक्षितः” अर्थात जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। शिक्षापत्री का मूल संदेश भी यही है कि व्यक्ति सत्य, अहिंसा, सेवा, सदाचार और भगवान भक्ति के मार्ग पर चले।
    व्यासपीठ से उन्होंने सत्संग और भगवान नाम की महिमा बताते हुए कहा कि भगवान और संतों के संग से जीवन का परिवर्तन संभव है। मन शुद्ध होने से सभी कार्य सिद्ध होने लगते हैं और विपरीत परिस्थितियों में भी व्यक्ति सबल, सफल और समझदार बन जाता है।
    उन्होंने कहा कि जब भाग्य प्रतिकूल होता है तो जीवन में परेशानियां बढ़ जाती हैं, लेकिन भगवान का नाम ऐसी औषधि है जो सभी पीड़ाओं को दूर कर देती है। भगवान में जप और तप करने से मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है।
    शास्त्री चिंतन प्रियदास जी ने कहा कि संसार के सभी रास्ते बंद हो जाएं तब भी भगवान का मार्ग सदैव खुला रहता है। जो व्यक्ति भगवान के नाम का आश्रय लेता है, भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते हैं।
    पुरुषोत्तम मास के महत्व का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि इस माह में किया गया जप, तप, उपवास और कथा श्रवण विशेष फलदायी होता है। अनजाने में भी यदि कोई पुरुषोत्तम मास का व्रत करता है तो उसे भगवान की कृपा प्राप्त होती है और जीवन रूपी संसार के बंधनों से मुक्ति मिलती है।
    उन्होंने सम्पुट दान का महत्व बताते हुए कहा कि पुरुषोत्तम मास में कांसे के सम्पुट में मालपुए भरकर दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। कथा के अंत में संतों ने कहा कि पुरुषोत्तम मास की कथा का श्रवण करने से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट होते हैं और जीवन में सुख, शांति एवं समृद्धि का आगमन होता है।

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